राहुल सांकृत्यायन - जीवन परिचय

राहुल सांकृत्यायन - जीवन परिचय 



  संक्षिप्त परिचय  

नाम - राहुल सांकृत्यायन 

जन्म - 1893 

वास्तविक नाम - केदारनाथ पांडे 

पिता - गोवर्धन पांडे 

माता - कुलवंती 

प्रारम्भिक शिक्षा - रानी की सारे तथा निजामाबाद| 

लेखन विधा - कहानी, उपन्यास, यात्रा साहित्य, आत्मकथा, यात्रा वृतांत, दर्शन, विज्ञान, इतिहास, कोशग्रंथ|

भाषा - संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भाषा | 

शैली - वर्णात्मक, विवेचनात्मक, व्यंगतमक, उद्धरण |

रचनाएं - वोल्गा से गंगा, मेरी लद्दाख यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, स्तमी के बच्चे|

मृत्यु - 1963 |

साहित्य मे स्थान - आधुनिक हिन्दी साहित्य के समर्थ रचनाकारों मे इन्हे शामिल किया हट है| 

जीवन परिचय 

राहुल सांकृत्यायन का हमन्म 1893 मे रविवार के दिन अपने नाना पाण्डित रंक्षरण पाठक के यहाँ पंद्रह ग्राम, जिला आजमगढ़ मे हुआ था| इनके पिता गोवर्धन पांडे एक कट्टर धर्मनिष्ट ब्रह्मयड थे| वे पंद्रह से दस मील दूर कनाइल ग्राम मे रहते थे| राहुल के बचपन का नाम केदारनाथ था| 'सांकृती' इनका गोत्र था| इसी के आधार पर ये सांकृत्यायन कहलाए|इन्हे घर का बंधन अच्छा न लगा| ये घूमना चाहते थे| इनके नाना पाण्डित रंक्षरण पाठक सिपाही थे और उस जीवन मे दक्षिण भारत की यात्रा की थी| इस विगत जुवान की कहानियाँ वे बालक केदारनाथ को सुनाया करते थे, जिसने इनके मन मे यात्रा के लिए प्रेम को अंकुरित कर दिया| इसके बाद इन्होंने कक्ष 3 की उर्दू पाठ्य पुस्तक पढ़ी थी, जिसमे एक शेर इस प्रकार था -

"सैर कर दुनिया की गाफिल जिदगनी फिर कहाँ?

जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ?" 

इस शेर के संदेश ने बालक केदार के मन पर गहरा प्रभाव डाल| इसके द्वारा इनके घुमक्कड़ी जुवान का सूत्रपात हुआ और आगे चलकर इन्होंने बाकायदा घुमक्कड़ों के निर्देशन के लिए 'गुमक्कड़ शास्त्र' की रचना की| राहुल के यात विवरण अत्यंत रोचक, रोमांच, शिक्षाप्रद, उत्साहवर्धक और ज्ञान प्रेरक हैं| इन्होंने 5-5 बार तिब्बत, श्रीलंका और सोवियत भूमि की यात्रा की थी| 6 मास यूरोप मे रहे थे| एशिया को इन्होंने जैसे छन ही डाल था|  कोरिया, मंचूरिया आदि की जगहों की यात्रा की| 

हिन्दी के महान उपासक राहुल जी ने हिन्दी भाषा और साहित्य की बहुमूची सेवा की| इनका अध्ययन जितना विशाल था, शाहीती सृजन भी उतना ही विराट था| अपनी जवान यात्रा मे राहुल ने 150 ग्रंथों का प्रणयन करके इन्होंने राष्ट्रभाषा के विकास मे महत्वपूर्ण योगदान किया| इन्होंने  धर्म, भाषा, गया, दर्शा, इतिहास, पुराण, राजनीति आदि विषयों पर अधिकार के साथ लिखा है| हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र मे इन्होंने 'अपभ्रंशकवी साहित्य', 'दक्खिनी', आदि श्रेष्ठ रचनाएं प्रसतुल की| 

"अपनी लेखन द्वारा मैंने उस जगत की भिन्न गतियों और विचित्रताओं को अंकितकरने की कोशिश की है, जिसका अनुमान हमारी तीसरी पीढ़ी बहुत मुश्किल से करेगी|"

रचनाएं :- 

कहानी - वोल्गा से गंगा, कनाइल की कथा, सतमी के बच्चे, बहुरंगी मधुपुरी |

उपन्यास - जय यउद्धेय, जीने के लिए, मधुर स्वप्न, सिंह सेनापति आदी | 

आत्मकथा - मेरी जीवन यात्रा | 




Post a Comment

Previous Post Next Post

Contact Form